Marital Rape: क्या पति का पत्नी से जबरन संबंध बनाना क्राइम है या नहीं, जानिये दिल्ली HC ने सुनाएगा फैसला

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दिल्ली हाई कोर्ट बुधवार को वैवाहिक रेप को अपराध घोषित करने के मामले में अपना फैसला सुनाएगा. इस मामले में पहले केंद्र सरकार ने मौजूदा कानून की तरफदारी की थी लेकिन बाद में यू टर्न लेते हुए इसमें बदलाव की वकालत की. हाई कोर्ट ने 21 फरवरी को सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था.


कोर्ट ने समाधान के बताए थे दो तरीके

फरवरी में हुई सुनवाई में बेंच के अगुआ जज न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने कहा था कि केंद्र सरकार को ही इस मुद्दे पर निर्णय लेने की जरूरत है. मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने के मुद्दे का समाधान करने के लिए सिर्फ दो तरीके हैं- अदालत का फैसला या कानून बनाकर. अगर केंद्र अपना रुख स्पष्ट नहीं करता है तो अदालत रिकॉर्ड में उपलब्ध हलफनामे के साथ आगे बढ़ेगी. इस मसले को हल करने का कोई तीसरा तरीका नहीं है.

मामले में पहले सरकार का यह कहा था  

केंद्र सरकार ने अपने पहले के हलफनामे में कहा था कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित नहीं किया जा सकता है. क्योंकि, इससे 'विवाह नाम की संस्था' खतरे में पड़ सकती है. इसे पतियों के उत्पीड़न के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन अब सरकार इस मसले से जुड़े कई आयामों पर विचार कर रही है.


सभी राज्यों का रुख जानना जरूरी

फरवरी में हुई सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कोर्ट को बताया था कि इस मामले में संवैधानिक चुनौतियों के साथ-साथ सामाजिक और पारिवारिक जीवन पर पड़ने वाले असर का भी अध्ययन करना जरूरी है. कानून, समाज, परिवार और संविधान से संबंधित इस मामले में हमें राज्य सरकारों के विचार जानना जरूरी होगा. इसके बगैर हम अपना कोई रुख नहीं बनाना और बताना चाहते. हमने राज्यों के मुख्य सचिवों और राष्ट्रीय महिला आयोग की चेयर पर्सन को लिखा है कि वो भी इस विषय में अपने अपने तर्क, दलीलें और सुझाव भेजें.

कानून में फेरबदल के लिए मिलेगा समय

फरवरी में सुनवाई के दौरान जस्टिस राजीव शकधर ने कहा था कि अगर इस मामले में विधायिका अपना आधिकारिक दखल देना चाहे या फिर मौजूदा कानून में कुछ फेरबदल करना चाहे तो हमें उसे भी देखना होगा. हम इसके लिए आपको उचित समय देंगे. हम समझते हैं कि यह गतिरोध की स्थिति है.

न कहने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकते

दिल्ली उच्च न्यायालय ने वैवाहिक दुष्कर्म  यानी मैरिटल रेप के कानूनी प्रावधान के सिलसिले में यौन संबंध बनाने से महिलाओं के मना करने के अधिकार को प्राथमिकता देते हुए यह कहा है कि महिलाओं के ना कहने के अधिकार से किसी भी सूरत में समझौता नहीं किया जा सकता. ऐसे लोगों को पहली नजर में ही सबूत और शिकायत मिलने के बाद सजा मिलनी चाहिए. इसमें संदेह की कोई कोई गुंजाइश ना हो